कोरोना संकट के इस कठिन समय में स्वरचित एक कोरोना गीत सस्वर आपके समक्ष

          कोरोना समय की एक कविता आपकी नज़र के लिए

सैलाब
लाॅकडाउन में नदी की उफनती लहरों सा
सारे बैरिकेट तोड़ता
राजमार्गों पर उमड़ आया है एक सैलाब
कोरोना समय में यह
भूख का उफनता समंदर है
जीवन को निगलता हुआ
दहशत में है देश
वे लौट रहें हैं
घरमुहां भेड़ बकरियों की तरह
शहर से गांव की ओर
उजड़े घोंसले के पंख पखेरू
अपने साथ लिए
जीवन बचाने की विवशता मे
उनके घिसटते लहूलुहान पांव के नीचे
अब कहीं कोई जमीन नहीं
फिर भी घरमुहां उम्मीद के साथ
वे लौट रहें हैं देह का नमक चाटते
सांसों का ईंधन जलाया
गाँव की ओर
वे नहीं पूछेंगे कभी
एक तरफा फैसले की कोई कैफ़ियत आपसे
नहीं करेंगे प्रश्न कोई
वे फिर फिर देखेंगे
उम्मीद भरी नज़रों से आपकी ओर
अंधेरे घर में प्राण की बाती जला कर
पीट लेंगे खाली थाली और
बुझा लेंगे ओस चाट कर अपनी प्यास
वे कोरोना से नहीं मरेंगे
वे मरेंगे भूख से
और अगर बच गये
तो फिर ढ़ोयेंगे आपकी पालकी।
 

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